पड़ी थी भीषण अकाल, कर वसूली नही होने से परेशान थे अंग्रेज,एक अंग्रेज इंजीनियर और एक भारतीय इंजीनियर ने बनाया था स्टीमेट
1930 में बने बांध बन गऐ थे मात्र 40 से 45 लाख में,
खुड़िया में बांध बनने से पहले 3 जगहो का किया गया था सर्वे, लेकिन अद्भूत प्राकृतिक भौगोलिक बनावट की वजह से खुड़िया में ही बना बांध
राजीव गांधी जलाशय के निर्माण की कहानी
Exclusive report -निक्कू जायसवाल (चीफ एडिटर)
लोरमी– उम्रदराज हो चुका खुड़िया जलाशय निर्माण के 100 वर्ष होने को है, आज भी पूरी मजबूती के साथ खड़ा है, और किसानों के लिए वरदान साबित हो रहा है, यह सिंचाई सुविधा की दृष्टि से किसानों के लिए जीवन दायिनी है, ऐसे में इसके निर्माण की बात होना लाजमी है, इसके निर्माण की कहानी जानने पर पता चलता है कि अंग्रेज हूकूमत के वायसराय (गर्वनर जनरल) लार्ड इरविन के आदेश पर खुड़िया बांध का निर्माण 1927 में प्रारंभ किया गया था, जो 1930 में बनकर पूरा हो गया। बांध को डिजाईन देने एव स्टीमेट बनाने के लिए एक भारतीय इंजीनियर उस समय के चीफ इंजीनियर राय बहादुर ज्वाला प्रसाद एवं प्रसिध्द अंग्रेज सिविल इंजीनियर कर्नल पोलार्ड लोस्ली थे जिनके मार्गदर्शन मे पूरा बांध को बनाया गया था। तत्कालिन समय में बांध महज 45 से 50 लाख रूपये की लागत में निर्मित हो गया था। हालाकिं बाद में इसकी लागत में इजाफा हो गया था। इससे पहले 3 जगह का सर्वे भी किया गया था चूकि खुड़िया बांध तीन ओर से अद्भूत प्राकृतिक भौगोलिक बनावट की वजह एवं मनियारी नदी की ढ़लान की वजह से जगह को चिन्हाकिंत किया गया था। अंग्रेज चाहते थे कि बांध की उचांई को बढ़ाया जाये एवं नहर को सिर्फ लोरमी, मुगेली, तखतपुर तक ही सीमित न रखते हुऐ एक नहर कोंटा तक ले जाने की तैयारी थी लेकिन बजट के अभाव में न तो बांध की उचाई ज्यादा बढ़ सकी और न ही नहर कोटा तक जा सका। बांध बनाने का मुख्य उद्देश्य क्षेत्र में पड़े भीषण अकाल और गरीबी, भूखमरी और महामारी था, उस समय हालात ऐसा हो गया था कि अंग्रेजो को न तो कर मिलता था और न ही भारतवासियों को अनाज, हैरान परेशान अंग्रेजो ने जमीदारी प्रथा के तत्कालिन कवर्धा महाराजा लाल धर्मराज सिंह से प्रस्ताव मांगा (उस समय कवर्धा जमीदारी प्रथा के अंतर्गत लोरमी का क्षेत्र आता था) प्रस्ताव में किसानो के लिए कुछ किया जाये तब महाराजा लाल धर्मराज सिंह ने अंग्रेजो के समक्ष खुड़िया बांध, खूंटाघाट, बांध बनाने एवं सिचाई सुविधा की उपलब्धता की मांग की। जिस पर मध्यभारत के डिप्टी गवर्नर सर फैंक जार्ज स्ली, एवं मोंटेग्यु शेराड डेविस बटलर ने अपने इंजीनियर भेजकर सर्वे कराया था । (चूंकि उस समय छत्तीसगढ़ मध्यभारत हुआ करता था) इंजीनियर में एक भारतीय राय बहादुर ज्वाला प्रसाद और अंग्रेजी इंजीनियर खुड़िया गांव आये और जगह को देखकर तीन जगह का सर्वे किया जिसमें खुड़िया गांव को ही चिन्हाकिंत कर स्टीमेट बनाया। बताया जाता है कि अंग्रेज बांध बनाने के कार्यो को बहुत तेजी से किया। उस समय भूखे मर रहे आसपास के क्षेत्रवासियो के लिए बांध का निर्माण किसी वरदान से कम नही था, जब बांध बनाने का काम शुरू हुआ तो मजदूर बड़ी संख्या में काम मांगने के लिए उनके पास गऐ लेकिन अंग्रेजो के क्रोध रूपी बाते और उनके कड़े कानून उनके सपनो को तोड़ रहे थे। जैसे तैसे मजदूरी से कार्य कराया गया और उन्हे महज 6 पैसे से लेकर 12 पैसे तक एक दिन का भुगतान करते थे, जिसमें एक ही ब्यक्ति के लिए अनाज ले पाते थे, हालांकि बाद में अंग्रेजो ने काम के बदले अनाज देना प्रारंभ किया था। सूत्र बताते है कि उस समय 1 हजार से अधिक मजदूर काम किऐ थे।

स्पैनिश फ्लू (इन्फ्लएंजा) बीमारी की चपेट में था पूरा भारत,लाखो लोगो को हुई थी मौत, गरीबी, बीमारी और सूखे से परेशान थे किसान-
क्षेत्र के निवासी उस समय (जिस समय खुड़िया बांध का निर्माण हुआ) स्पैनिश फ्लू (इन्फ्लएंजा) बीमारी की चपेट में थे पूरे भारत में लाखो लोगो की मौत हो गई थी, किसान एक तरफ सूखे की मार अनाज के लिए मोहताज हो रहे थे तो दूसरी तरफ बीमारी ने झकझोर कर रख दिया था, न स्वास्थ्य ब्यवस्था, न अस्पताल और न ही डाॅक्टर, इधर भीषण सूखा पड़ने से किसान बेमौत मरने की नौबत आ गई थी। अंग्रेज सिपाही कर वसूली के लिए धमक रहे थे।

अंग्रेजो की दूरदर्शी सोंच 100 साल पहले बने एक्वाडक्ट के माध्यम से शुरू में 20 हजार हेक्टेयर कृषि भूमि के लिए तैयार किया था नहर लेकिन बाद में आज उसी नहर मे 52 हजार हेक्टेयर भूमि की हो रही सिंचाई, जानते थे बाद में बढ़ेगा सिचाई का रकबा
लगभग 200 साल तक भारत में हूकुमत करने वाले अंग्रेजो की दूरदर्शी सोंच एैसी थी कि आज भी उनके द्वारा निर्माणाधीन चीजे बिना खराब हुऐ खड़े हुऐ है। जब खुड़िया बांध का निर्माण कराया गया था तब सिंचित क्षमता मात्र 20 से 25 हजार हेक्टेयर तक ही सिमित था, लेकिन आज 52 हजार से अधिक हेक्टेयर कृषि भूमि का सिंचाई हो रहा है। अब इस बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि अंग्रेज कितने दूर का सोंचते थे उनको पता था कि समय के हिसाब से बांध की सिचांई क्षमता बढ़ेगी जिससे एक्वाडक्ट पर दबाव बनेगा, इसलिए उन्होने 52 हजार हेक्टेयर कृषि भूमि सिचांई क्षमता के अनुरूप एक्वाडक्ट का निर्माण कराया था।

बांध को बनाने के लिए खुड़िया के उपरी हिस्से से लाई गई थी विशेष मिट्टी जिसको मिक्स कर किया निर्माण, बजट के अभाव में कम कर दिया उचांई, नहर को कोटा तक ले जाने की थी तैयारी लेकिन पैसे के अभाव में बंद करना पड़ा अभियान-
जब खुड़िया बांध का निर्माण हुआ था तो उस समय तत्काल में अंग्रेजो के पास न तो सीमेंट था और न ही पत्थर और न ही प्रशिक्षित कारीगर, इसलिए बांध का निर्माण मिट्टी से ही किया गया, बांध को बनाने के लिए एक विशेष प्रकार की मिट्टी की आवश्यकता पड़ी जो खुड़िया बांध के 5 किमी उपरी हिस्से से लाई गई थी, मिट्टी को पहले मिक्स करके उसे मिलाया जाता था फिर उस मिले हुऐ मिट्टी को बांध की दिवार बनाने के लिए उपयोग किया गया। आज बांध 27 फीट उंची है, जितनी उंची है उतनी 10 गुना चौड़ा नीचे से पड़़ल डालकर बांध का निर्माण किया गया है। बांध की उचांई और भी ज्यादा करने अंग्रेज अधिकारीयों ने अपने उच्चाधिकारियों के पास प्रस्ताव रखा था लेकिन बजट नही होने के कारण जितना मौजूदा स्थिती में है उतना ही कर दिया गया। वही बिलासपुर क्षेत्र में भी पड़ रहे अकाल को देखते हुऐ किसानो को सिंचाई सुविधा देने के लिए नहर को कोंटा क्षेत्र तक ले जाना चाहते थे लेकिन यहां भी बजट एवं दूरी की समस्या आ गया था।

खाता-बही हिसाब/किताब के लिए अंग्रेज रखे थे स्पेशल तिजौरी (चेस्ट), अंग्रेजो के द्वारा बनाऐ गऐ खुड़िया के विश्रामगृह में आज भी मौजूद-
अंग्रेज जिस बहादुरी और कार्य कौशलता के लिए जाने जाते थे, वैसी ही ज्ञान हिसाब/किताब के लिए भी मशहूर थे, एक-एक पैसे का हिसाब रखना एवं मजदूरो के डेली हाजिरी उनके प्राथमिकता में रही, अंगेज जब खुड़िया बांध का निर्माण करने के लिए आऐ थे तो अपने साथ में रोकड़ बही, हिसाब किताब का पूरा बंदोबश्त लेकर आऐ थे, साथ ही तिजौरी भी लेकर आऐ थे, जिसमें पूरा पैसा और हिसाब रखते थे, जो आज भी अंग्रेज के जमाने में बनाऐ गऐ रेस्ट हाउस खुड़िया में तिजौरी (चेस्ट) रखा हुआ है।

बांध में प्रतिवर्ष पानी आवक उपलब्ध से डेढ़ गुना ज्यादा, सिंचित रकबे में हो सकती है बढ़ोत्तरी, विभाग ने नही किया प्रयास-
अंग्रेज के जमाने में बने बांध में प्रतिवर्ष आवक उपलब्ध जलाभराव से डेढ़ गुना पानी की आवक होती है। लेकिन 147. 70 घनमीटर जलभराव के बाद वेस्ट वेयर से पानी बाहर आ जाती है, पूरी मानसूनी बारिश की बात करें तो प्रतिवर्ष (अगर अच्छी बारिश होती है तब) बांध से डेढ़ गुना पानी वेस्ट वेयर से बाहर हो जाता है, आजाद भारत में बांध में किसी प्रकार का पानी रोकने एवं क्षमता बढ़ाने की दिशा में प्रयास नही किया गया। अगर किया गया होता तो आज बांध में ज्यादा पानी स्टोरेज कर सिंचित रकबे में बढ़ोत्तरी कर सकते थे,

इनका कहना है:- लोरमी में अनुविभागीय अधिकारी के रूप में पदस्थ रहे एम कुरैशी (रिटायर्ड एसडीओ लोरमी सिचाई विभाग) ने चर्चा के दौरान बताया कि अंग्रेजो ने 1920 से लेकर 1930 तक बांध का निर्माण कराने की ऐतिहासिक जानकारी पुस्तक में मिलता है। अंग्रेज खुड़िया गांव का सर्वे कर उसी जगह बांध बनाने का निर्णय लिया गया था, अंग्रेज हिसाब किताब करने के लिए उस समय तिजौरी (चेस्ट) रेस्ट हाउस में रखे गऐ है, मैं जब 1990 के बाद आया तो कुछ पैसे और कुछ कागजात थे लेकिन 100 वर्ष के होते होते रिकार्ड सड़ने लगा। कुछ उस समय के पैसे भी थे जो पूरी तरह से सड़ गऐ। नीचे रेस्ट हाउस भी अंग्रेजो के समय में बनाये गऐ थे, उपर के रेस्ट हाउस के छोटे छोटे कमरे भी उसी समय निर्मित किया गया था, आज अंग्रेजो के द्वारा किऐ गऐ निर्मित मकानो मे लोहे का कोड़ा लगा हुआ है। जब अंग्रेजो ने बांध का निर्माण कराया तो उस के बने एक्वाडक्ट आज भी पूरी मजबूती के साथ खड़े हुऐ है। मेरी जानकारी में 25 हजार क्षमता के सिचाई सुविधा की शुरूआत किया गया था बाद में आज 52 हजार हेक्टेयर कृषि भूमि का रकबा सिंचित होता है, सोचिऐ अंग्रेजो की कितनी दूरदर्शी सोंच रही होगी उनके द्वारा निर्मित एक्वाडक्ट आज 52 हजार पानी की क्षमता को बराबर संभाल रहा है।


